सर्दियों की धूप

धुँध और कोहरे

से लदी है हवा

ओस में दबी

जा रही घास

अंधेरे में कट रहे

ठिठुरते दिन

पाला न दिखा

कुछ भी ना दिखा

दिखा धुँधलापन

सिर्फ़ धुआँ ही धुआँ

ये कड़वी हवा बदलो

नयी हवा चले

जो लेकर आएगी

सर्दियों की धूप

जिनमें खेलें बच्चे

और गिलहरियाँ

अम्मा, ताई, दादी

सब स्वैटर बुनें

लॉन में बैठक हो

सुनहरी धूप खिले

– सहर

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खोज खुदा की। 

कोई कहता है मंदिर में मिलेगा

तो कोई कहता है मस्जिद में ढूँढो

कोई बताता है रास्ते अनेक

तो कोई सुझाता है खुद से पूछो
कहीं किसी ने कहा कि पत्थरों

के सामने हो जा नतमस्तक

तो किसी ने मुझे पढ़ाई

गीता और कुरआन की पुस्तक
किसी ने यह न बताया आज तक

की ईश्वर कौन है ?

जिससे भी पूछो यह सवाल

वो आज तक मौन है
शराबी से पूछा तो उसने

मदिरालय का रास्ता दिखाया

पंडित से पूछा तो

महागुरुओं से मिलवाया
कहा मौलवी ने कि है ये

सब अल्लाह की हुकूमत

कौन जानता है आखिर

कैसे बन गयी ये कुदरत
ढूंढा मैंने बड़ी बेसब्री से खुदा को

समझना चाहा अपनी बदलती अदा को
रफ्ता-रफ्ता अब ज़ेहन में

उतर रहा है ये एहसास

मेरे लफ़्ज़ों में ही रहता है

वो हर लम्हा मेरे पास
           – सहर

दीप-कविता-वली

जब नभ-नभ में विस्तृत

देखी अंधकार की छाया

प्रण प्रकाश का लेकर 
आखिर हमने दीप जलाया

कण-कण में  हुई प्रज्जवलित 
मधुर मनोहर स्वर्णिम काया 
देख प्रकाशित जग को 
फिर अंधकार झल्लाया 

मन-मन में आलोक हुआ 
अंतर्मन का अहं मिटाया 
मैं का विलय हुआ हरि से 
फिर मैं को ढूंढ न पाया 

पग-पग बिखरी दीप श्रृंखला 
भागी अंधकार की छाया
मन का तम हरना था 
सो प्राणों का दीप  जलाया
                         – सहर 

रिमझिम। 

ये रिमझिम भी कितना रिझाती है,

कभी हंसाती है, कभी रुलाती है। 


इसकी बूंदों में नमी भी है आग भी,

कभी बुझाती है, कभी जलाती है।

जब कभी भी भीगता हूँ अब इसमें,

हर बार सिर्फ तुम्हारी ही याद आती है। 

ए खुदा

जो जहर मुझे यार से मिला दे
एे खुदा वो मुझे दिला दे
जिन फूलों की महक से
मिट जाए सब नफरतें
वो फूल सारे मुझ में खिला दे
वो आग जिस में जलकर
मैं खुद से मिल सकूं
एेसी अाग में मुझ को जला दे
अब्र जो सीने में दे ठंडक
वो तू मेरे लहू में मिला दे
एे खुदा मेरे यार से मिला दे
फिर चाहे सजा दे
या खुद में मिला दे।

– सहर

वो रात 

” सवाली थी वो रात 

जिसमें जवाब कहीं न था 

नींद बहुत थी आँखों में 

कोई ख्वाब कहीं न था। ”

                        – सहर 

एक ग़ज़ल 

जिस रोज़ मिलना मेरे सिरहाने,
आँखों में काजल मत लगाना
और ना ही दिल पर ताले।
फैल जाएगा काजल तुम्हारा
इन झील जैसी आँखों के किनारे ,
और टूट जाएँगे सारे ताले
चाहे दिल के हों या ज़ुबाँ पर।

– सहर

लेखनी का अधिकार 

मैं नहीं जानता
मैं नहीं चाहता
लेकिन फिर भी
मुझसे पूछे बिना
उधेड़ कर मुझे
मेरे शब्दों में
पटक रही है
बार-बार।
मेरी लेखनी का
मुझपर पूर्ण
अधिकार है।

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