एक ग़ज़ल 

जिन्हें एक मुद्दत से,सजा रखा था पैमाने में,
उन महफिलों ने आज जाकर,दम तोड़ा मैखाने में ।

बहुत अंधेरों से उजालों में, खींच लाया हूँ इस रात को,
कोई उम्मीद जिंदा है, आज भी इस दीवाने में ।

वो रेत में ढूंढता था, न जाने कौन सा दरिया,
एक बूंद तक न मिली जिसे सारे ज़माने में ।

लापता हो गयी उसकी आँखों से दीवानगी,
इस दुनिया के धुएँ के कारखाने में ।

फिर भी, दिल खोलकर बाँटता रहा वो खुशियों की दौलत,
कोई अजीब सुकूं मिलता था उसे खुद को लुटाने में ।

अपनी मोहब्बत का ज़िक्र अब तलक़ किसी को न किया,
वो शिकस्त कहाँ याद करने में जो खायी भूल जाने में ।

ख़ामोशी से बैठकर वो हर रोज़ शब से सहर,
ढूँढ़ता रहा महफिलों को पैमाने में।

– सहर

featured photograph ©mayank mishra.

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