एक ग़ज़ल महबूब के नाम। 

                                   – सहर 

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एक ग़ज़ल 

जिस रोज़ मिलना मेरे सिरहाने,
आँखों में काजल मत लगाना
और ना ही दिल पर ताले।
फैल जाएगा काजल तुम्हारा
इन झील जैसी आँखों के किनारे ,
और टूट जाएँगे सारे ताले
चाहे दिल के हों या ज़ुबाँ पर।

– सहर

लेखनी का अधिकार 

मैं नहीं जानता
मैं नहीं चाहता
लेकिन फिर भी
मुझसे पूछे बिना
उधेड़ कर मुझे
मेरे शब्दों में
पटक रही है
बार-बार।
मेरी लेखनी का
मुझपर पूर्ण
अधिकार है।

तेज़ाब 

हसीन चेहरों को जला डाला
वहशियों ने तेज़ाब से
पर तनिक भी ना मिट सकी
मुस्कान उन चेहरों के दिलो-दिमाग़ से।

ख़ूबसूरती भी गुनाह है
दिखने लगा है
होली में जब गुलाल की जगह
वो गालों पर तेज़ाब मलने लगा है।

सड़कों पर, घरों में
जल रही रूह से जिस्म तक
ममता की देवियाँ, बेटियाँ
काट डालो दहेज की बेड़ियाँ।

सूखी है ज़मीं, है आब की कमी
पी रहीं हैं तेज़ाब,
जलती बहुएँ माँगती हैं
दहेज का हिसाब।

माँ की कोख में मौत मत भरो
उसे ज़िंदगी से सजाओ
बेटी को दो जीवन लाजवाब

नहीं है अगर इंसानियत बची
तो और ढोंग ना रचाओ
उतारो, फेंको ये काले नक़ाब।

आज-कल तो बरसता भी है
नदियों में बहता भी है
मेरी आँखों से वक़्त-बेवक्त
छलकता भी है, बस तेज़ाब
– सहर

बरसात

आज मैंने बारिश देखी
घने आसमान के तले
झाँक रही थी रोशनी
और सतरंगी बूँदें,
चारों ओर चल रही थीं

बारिश है ताप का निचोड़
ठंडी बूँदें बता रहीं थीं
जब मिलेगा यह जल
पुरुषार्थ की रक्त-धूलि से
उस उदय के शिखर पर
एक सूर्योदय चमकेगा

चंचल तितलियाँ मधुर कलरव
सबको सुना रहीं थीं
वर्षा-ध्वनि मेघदूत
बनकर गीत गा रही थी।

इरशाद- 25

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” डूब जाए शमा चरागों को हँसाने की जुस्तुजू में ,
रात भर इसी सिलसिले में बस परवाने फ़िदा होते रहे। “

– सहर

Ek ghazal.

जो अधूरी छोड़ दी थी लिखकर कहीं
वो ग़ज़ल अब शायद मुकम्मल हो जाये।
एक अरसे से जो क़ैद थी दिल में
वो धड़कन अब शायद खो जाये।
कोई और नशा महसूस नहीं होता
जब नसों में इश्क़ लहू हो जाये।
ले रहा है बस उसका नाम बार-बार
ये वो दिल है जिसे दिलबर की आरज़ू हो जाये।
– सहर

जो ग़ज़ल है

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जिस ग़ज़ल से हमें दिल्लगी है
उस के जिस्म में कहीं दिल नहीं हैं |
 
वो सहरा में लिपटा जल रहा है ख़ुद
उसके दरिया में कहीं जल नहीं है  |
 
उसके साथ ज़िंदगी है कुछ ऐसी
जर्रों की ख़ाक को इंसां कर दे |
 
वो ग़ैरत की बेड़ियाँ गर पहना दे
तो अजनबियों को भी अपना कर दे |
 
कहानी कुछ ऐसी लिखी है उन्होनें
जो सच को भी सपना कर दे |
 
जिनकी चमक से हमें रोशनी है
उन्हें आज कल रोशनी की कमी है |
 
जिस ग़ज़ल से हमें दिल्लगी है
उस के जिस्म में कहीं दिल नहीं है  |
 
 
                      – sahar

बचपन

बचपन

बड़े अच्छे दिन थे बचपन के
भोली भाली आवारगी थी
हल्के-हल्के धुँधले ख़्वाब थे
छोटी-छोटी चाहतें थीं
मुस्कान चेहरे की चौखट पर
डेरा बसाए रहती थी
ये दुनिया हमें अपने
सीने से लगाए रखती थी
हम सो भी जाएँ थककर
तो रात जगाए रखती थी
सुबह सूरज की चमक
आँखें बिछाए रहती थी
पतंगे हमारी उड़ान की
छोटी छोटी हमनवा
आसमान में कब तक
आँखें गड़ाए रखते थे
लहरें हमारी ख़ुशियाँ थी
दो चार हमारे नाम थे
बड़ी छोटी हमारी दुनिया
पर बड़े हमारे काम थे
तारों पर हुक्म चलाते थे
हर वक़्त गीत गाते थे
हवाओं पर सवार होकर
मीलों घूम आते थे
चिड़ियों के घोसलों से
अंडे चुराते थे
बड़े भोले दिन थे बचपन के
बात बात पर शर्माते थे
बड़े अच्छे दिन थे बचपन के।

‘सहर’

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