इरशाद – 5 

मैं किस ज़मीं पर पैर रखूँ,

ये धरती पिघल रही है।  

भरोसा भी तो किस का करें,

हर वक़्त यहाँ सबकी हस्ती बदल रही है। 

ना ठिकाना हमारा है कोई

और ना ही हमारी मंज़िल का 

जहाँ रह गये वो घर है ,

हर रोज़ क्यूँ बस्ती बदल रही है। 

दरिया की सैर पर जाये भी तो कैसे

हर लहर पर यहाँ मेरी कश्ती बदल रही है। 

                               – सहर 

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