इरशाद – 1

मेरे रक्त में कविता बह रही है,
बहते बहते मुझसे कुछ कह रही है |
– सहर

ज़रूरी हो गया है |

ज़रूरी हो गया है अब खुद में सिमटना,
ख्यालों को बंद ही रखना, खुद में रहना |
अब जरुरी हो गया है खुद से लिपटना,
खुद को समझना, खुद से निबटना,
बंद तालों में खुद को क़ैद करना,
अंधेरों में चुपचाप बैठना,
अकेले ही अकेले में अकेले रहना,
ज़रूरी हो गया है खुद से मिलना |
सुना नहीं जाता है अब शोर इस जहाँ का,
ज़रूरी हो गया है खुद को सुनना |
कहाँ तक जंग लड़ सकूँगा,
आखिर कब तक ये जेहाद कर सकूँगा,
ज़रूरी हो गया है खुद से जेहाद करना |
मिलते-जुलते चेहरे देख देख कर,
भूलता हूँ मैं सबकी सूरतें,
ज़रूरी हो गया है खुद से मुलाकात करना,
खुद से खुद की बात करना |
ज़रूरी हो गया है वारदात करना,
ज़रूरी हो गया है इस सुबह की रात करना,
वक़्त से खुद का हिसाब करना |
एक मुद्दत से टाल रहे थे जिस काम को,
ज़रूरी हो गया है वो काम करना,
ज़रूरी हो गया है अब,
खुद को खुद के नाम करना,
खुद का एहतेराम करना |
मोड़कर मुंह दुनिया के चेहरे से,
ज़रूरी हो गया है खुद को बेनकाब करना,
ज़रूरी हो गया है इन्कलाब करना,
अब जरुरी हो गया है खुद से बात करना |
                                      – सहर

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