इरशाद – 12

image shayari for अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन...
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कुछ भावनाएँ

कुछ लोग न जाने कहाँ खो गए इस भीड़ में ?
कोई आहट ना , न दिखाई दिये
शोरगुल एसा था हर जगह,
ना हमें सुन सके ना सुनाई दिये
पहले जिन्दगी फिर यादों से कुछ यूँ हुये रुख़सत
कि फिर सपनों में भी ना दिखाई दिये।

– सहर

दो ग़ज़लें

1-
जी रहे थे हम एक मोती की ख़्वाहिश लिए
तू मिला कि जैसे समन्दर मिल गया ।
वक़्त बेवक्त एक साथी की कमी खलती थी
तू मिला तो मुझे हमसफ़र मिल गया ।
इंतज़ार है कि कभी हम-तुम भी मिलेंगे
कह सकूँगा कि शब को ‘सहर’ मिल गया  ।
2-
जो अधूरी छोड़ दी थी लिखकर कहीं
वो ग़ज़ल अब शायद मुकम्मल हो जाये।
एक अरसे से जो क़ैद थी दिल में
वो धड़कन अब शायद खो जाये।
कोई और नशा महसूस नहीं होता
जब नसों में इश्क़ लहू हो जाये।
ले रहा है बस उसका नाम बार-बार
ये वो दिल है जिसे दिलबर की आरज़ू हो जाये।
– सहर

इरशाद – 1

मेरे रक्त में कविता बह रही है,
बहते बहते मुझसे कुछ कह रही है |
– सहर

ज़रूरी हो गया है |

ज़रूरी हो गया है अब खुद में सिमटना,
ख्यालों को बंद ही रखना, खुद में रहना |
अब जरुरी हो गया है खुद से लिपटना,
खुद को समझना, खुद से निबटना,
बंद तालों में खुद को क़ैद करना,
अंधेरों में चुपचाप बैठना,
अकेले ही अकेले में अकेले रहना,
ज़रूरी हो गया है खुद से मिलना |
सुना नहीं जाता है अब शोर इस जहाँ का,
ज़रूरी हो गया है खुद को सुनना |
कहाँ तक जंग लड़ सकूँगा,
आखिर कब तक ये जेहाद कर सकूँगा,
ज़रूरी हो गया है खुद से जेहाद करना |
मिलते-जुलते चेहरे देख देख कर,
भूलता हूँ मैं सबकी सूरतें,
ज़रूरी हो गया है खुद से मुलाकात करना,
खुद से खुद की बात करना |
ज़रूरी हो गया है वारदात करना,
ज़रूरी हो गया है इस सुबह की रात करना,
वक़्त से खुद का हिसाब करना |
एक मुद्दत से टाल रहे थे जिस काम को,
ज़रूरी हो गया है वो काम करना,
ज़रूरी हो गया है अब,
खुद को खुद के नाम करना,
खुद का एहतेराम करना |
मोड़कर मुंह दुनिया के चेहरे से,
ज़रूरी हो गया है खुद को बेनकाब करना,
ज़रूरी हो गया है इन्कलाब करना,
अब जरुरी हो गया है खुद से बात करना |
                                      – सहर

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