Ek ghazal.

जो अधूरी छोड़ दी थी लिखकर कहीं
वो ग़ज़ल अब शायद मुकम्मल हो जाये।
एक अरसे से जो क़ैद थी दिल में
वो धड़कन अब शायद खो जाये।
कोई और नशा महसूस नहीं होता
जब नसों में इश्क़ लहू हो जाये।
ले रहा है बस उसका नाम बार-बार
ये वो दिल है जिसे दिलबर की आरज़ू हो जाये।
– सहर

इरशाद – 14

शायरी की गहराइयों में हौसला है और उम्मीद भी, शायद आप भी इन लफ़्ज़ों को पढ़कर ये समझ पाएं :

“इतना भी ना-उम्मीद दिल-ए-कम-नज़र न हो,
मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो |”

                                                  – नरेश कुमार शाद |

Urdu Words:

ना-उम्मीद : Hopeless, dejected
दिल-ए-कम-नज़र- narrow sighted heart
शाम-ए-अलम- evening of sorrow
सहर – dawn,morning

दो ग़ज़लें

1-
जी रहे थे हम एक मोती की ख़्वाहिश लिए
तू मिला कि जैसे समन्दर मिल गया ।
वक़्त बेवक्त एक साथी की कमी खलती थी
तू मिला तो मुझे हमसफ़र मिल गया ।
इंतज़ार है कि कभी हम-तुम भी मिलेंगे
कह सकूँगा कि शब को ‘सहर’ मिल गया  ।
2-
जो अधूरी छोड़ दी थी लिखकर कहीं
वो ग़ज़ल अब शायद मुकम्मल हो जाये।
एक अरसे से जो क़ैद थी दिल में
वो धड़कन अब शायद खो जाये।
कोई और नशा महसूस नहीं होता
जब नसों में इश्क़ लहू हो जाये।
ले रहा है बस उसका नाम बार-बार
ये वो दिल है जिसे दिलबर की आरज़ू हो जाये।
– सहर

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