जो ग़ज़ल है

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जिस ग़ज़ल से हमें दिल्लगी है
उस के जिस्म में कहीं दिल नहीं हैं |
 
वो सहरा में लिपटा जल रहा है ख़ुद
उसके दरिया में कहीं जल नहीं है  |
 
उसके साथ ज़िंदगी है कुछ ऐसी
जर्रों की ख़ाक को इंसां कर दे |
 
वो ग़ैरत की बेड़ियाँ गर पहना दे
तो अजनबियों को भी अपना कर दे |
 
कहानी कुछ ऐसी लिखी है उन्होनें
जो सच को भी सपना कर दे |
 
जिनकी चमक से हमें रोशनी है
उन्हें आज कल रोशनी की कमी है |
 
जिस ग़ज़ल से हमें दिल्लगी है
उस के जिस्म में कहीं दिल नहीं है  |
 
 
                      – sahar
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वक़्त की धूल 

कुछ चीज़ें कभी पुरानी नहीं होती
वक़्त की धूल उड़ जाती है ख़ुद बख़ुद
समय की ज़ंग नहीं मिटा पाती,
कई यादों की चमक ।
ये मज़बूत चट्टान वक़्त की,
काट नहीं पाती उन लम्हों की लहरों को ।
जो उफान ले रही हैं मन की रेत पर
बचपन, दोस्ती और आवारगी
अरसों पुरानी पहली दिल्लगी,
जब बचायी थी पहली ज़िन्दगी ।
सब कहते हैं वक़्त से कोई जीत नहीं सकता,
पर मेरी यादों से वो हर बार हार जाता है ।
कुछ चीज़ें कभी पुरानी नहीं होती
ख़ुद बख़ुद उड़ जाती है वक़्त की धूल

– सहर

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