Ek ghazal.

जो अधूरी छोड़ दी थी लिखकर कहीं
वो ग़ज़ल अब शायद मुकम्मल हो जाये।
एक अरसे से जो क़ैद थी दिल में
वो धड़कन अब शायद खो जाये।
कोई और नशा महसूस नहीं होता
जब नसों में इश्क़ लहू हो जाये।
ले रहा है बस उसका नाम बार-बार
ये वो दिल है जिसे दिलबर की आरज़ू हो जाये।
– सहर

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जो ग़ज़ल है

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जिस ग़ज़ल से हमें दिल्लगी है
उस के जिस्म में कहीं दिल नहीं हैं |
 
वो सहरा में लिपटा जल रहा है ख़ुद
उसके दरिया में कहीं जल नहीं है  |
 
उसके साथ ज़िंदगी है कुछ ऐसी
जर्रों की ख़ाक को इंसां कर दे |
 
वो ग़ैरत की बेड़ियाँ गर पहना दे
तो अजनबियों को भी अपना कर दे |
 
कहानी कुछ ऐसी लिखी है उन्होनें
जो सच को भी सपना कर दे |
 
जिनकी चमक से हमें रोशनी है
उन्हें आज कल रोशनी की कमी है |
 
जिस ग़ज़ल से हमें दिल्लगी है
उस के जिस्म में कहीं दिल नहीं है  |
 
 
                      – sahar

बचपन

बचपन

बड़े अच्छे दिन थे बचपन के
भोली भाली आवारगी थी
हल्के-हल्के धुँधले ख़्वाब थे
छोटी-छोटी चाहतें थीं
मुस्कान चेहरे की चौखट पर
डेरा बसाए रहती थी
ये दुनिया हमें अपने
सीने से लगाए रखती थी
हम सो भी जाएँ थककर
तो रात जगाए रखती थी
सुबह सूरज की चमक
आँखें बिछाए रहती थी
पतंगे हमारी उड़ान की
छोटी छोटी हमनवा
आसमान में कब तक
आँखें गड़ाए रखते थे
लहरें हमारी ख़ुशियाँ थी
दो चार हमारे नाम थे
बड़ी छोटी हमारी दुनिया
पर बड़े हमारे काम थे
तारों पर हुक्म चलाते थे
हर वक़्त गीत गाते थे
हवाओं पर सवार होकर
मीलों घूम आते थे
चिड़ियों के घोसलों से
अंडे चुराते थे
बड़े भोले दिन थे बचपन के
बात बात पर शर्माते थे
बड़े अच्छे दिन थे बचपन के।

‘सहर’

इरशाद- 24 

“Wo shaksha jis se main chahta tha milna
Andheron mein gum baitha tha meri parchayee mein.”
– sahar

“वो शख्स जिस से मैं चाहता था मिलना,
अंघेरों में गुम बैठा था मेरी परछायी में।”

सहर

Irshaad- 23

“ऐसा क्या हुआ कि हम भूल गए 

अपने रंग , अपने शबाब 

धुलते गए हर बारिश के साथ 

हमारे शौक़ , हमारे रुबाब 

अपनी महफ़िलों से उठकर, आ गए ये कहाँ 

अब चढ़ती नहीं उस क़दर वो पुरानी शराब 

यूँ ही गुज़रा जा रहा है ये कारवाँ भी 

क़ैद होकर ही रह गया लफ़्ज़ों का सैलाब ”   

                                           – Mayank ‘Sahar’ Mishra

 

 

इरशाद-20

” न मैं हिन्दू हूँ और न तू है मुसलमान,
अब न जले तेरा घर, न झुलसे मेरा मकान,
आओ पढ़ें चैन-ओ-अमन की किताब,
मैं जला दूँगा अपनी गीता, तुम जला दो अपनी क़ुरान।”
– सहर

इरशाद-10

ख़्वाब अनगिनत और बेशक़ीमती थे,
सिर्फ ख्वाबों की कोई नहीं बिसात ।
जब चला मुसाफिर बन के सफर पर,
हर दर जीता, हर दर खायी मात।

– सहर।

translation:

dreams were infinite and priceless,
but dreams alone held no value.

when I actually travlled the distance ,
I won everywhere and everywhere I lost.

– sahar

इरशाद -9 

धुँध सा छा गया है चारों ओर,
सुनता हूँ ख़ामोशियों का शोर
खो गया हर शख़्स इंसानियत का,
कमज़ोर सी है हर डोर ।

बहुत कुछ सोचा था,
पर लग गये शायद वक़्त को |
टूटे ख़्वाबों की काँच बटोरता हूँ,
कुछ टुकड़े मिलते हैं मोहब्बत से रंगे।

– सहर

English Translation.

There us a dense fog all around,
I listen the noise of silence.
Ever last man of humanity is lost,
every thread of love is fragile.

I planned a lot of things,
but time indeed has wings.
As I collect the pieces of my broken dreams,
I occasionally find love stained fragments. 

– sahar

इरशाद -9 

धुँध सा छा गया है चारों ओर,
सुनता हूँ ख़ामोशियों का शोर
खो गया हर शख़्स इंसानियत का,
कमज़ोर सी है हर डोर ।

बहुत कुछ सोचा था,
पर लग गये शायद वक़्त को |
टूटे ख़्वाबों की काँच बटोरता हूँ,
कुछ टुकड़े मिलते हैं मोहब्बत से रंगे।

– सहर

English Translation.

There us a dense fog all around,
I listen the noise if silence.
Ever last man of humanity is lost,
every thread of love is fragile.

I planned a lot of things,
but time indeed has wings.
As I collect the pieces of my broken dreams,
I occassionally fund sone fragments stained with love.

– sahar

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