Irshaad- 23

“ऐसा क्या हुआ कि हम भूल गए 

अपने रंग , अपने शबाब 

धुलते गए हर बारिश के साथ 

हमारे शौक़ , हमारे रुबाब 

अपनी महफ़िलों से उठकर, आ गए ये कहाँ 

अब चढ़ती नहीं उस क़दर वो पुरानी शराब 

यूँ ही गुज़रा जा रहा है ये कारवाँ भी 

क़ैद होकर ही रह गया लफ़्ज़ों का सैलाब ”   

                                           – Mayank ‘Sahar’ Mishra

 

 

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इरशाद – 4 

रोज़ सोचते हैं कुछ नया होगा ,

अब तू मिल भी जाए तो क्या होगा ?

जिस इंसान ने चाहा था तुम्हें 

मर चुका है वो, पता होगा।  

        – सहर

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