खोज खुदा की। 

कोई कहता है मंदिर में मिलेगा

तो कोई कहता है मस्जिद में ढूँढो

कोई बताता है रास्ते अनेक

तो कोई सुझाता है खुद से पूछो
कहीं किसी ने कहा कि पत्थरों

के सामने हो जा नतमस्तक

तो किसी ने मुझे पढ़ाई

गीता और कुरआन की पुस्तक
किसी ने यह न बताया आज तक

की ईश्वर कौन है ?

जिससे भी पूछो यह सवाल

वो आज तक मौन है
शराबी से पूछा तो उसने

मदिरालय का रास्ता दिखाया

पंडित से पूछा तो

महागुरुओं से मिलवाया
कहा मौलवी ने कि है ये

सब अल्लाह की हुकूमत

कौन जानता है आखिर

कैसे बन गयी ये कुदरत
ढूंढा मैंने बड़ी बेसब्री से खुदा को

समझना चाहा अपनी बदलती अदा को
रफ्ता-रफ्ता अब ज़ेहन में

उतर रहा है ये एहसास

मेरे लफ़्ज़ों में ही रहता है

वो हर लम्हा मेरे पास
           – सहर

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इरशाद-20

” न मैं हिन्दू हूँ और न तू है मुसलमान,
अब न जले तेरा घर, न झुलसे मेरा मकान,
आओ पढ़ें चैन-ओ-अमन की किताब,
मैं जला दूँगा अपनी गीता, तुम जला दो अपनी क़ुरान।”
– सहर

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