एक ग़ज़ल महबूब के नाम। 

                                   – सहर 

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Ek ghazal.

जो अधूरी छोड़ दी थी लिखकर कहीं
वो ग़ज़ल अब शायद मुकम्मल हो जाये।
एक अरसे से जो क़ैद थी दिल में
वो धड़कन अब शायद खो जाये।
कोई और नशा महसूस नहीं होता
जब नसों में इश्क़ लहू हो जाये।
ले रहा है बस उसका नाम बार-बार
ये वो दिल है जिसे दिलबर की आरज़ू हो जाये।
– सहर

जो ग़ज़ल है

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जिस ग़ज़ल से हमें दिल्लगी है
उस के जिस्म में कहीं दिल नहीं हैं |
 
वो सहरा में लिपटा जल रहा है ख़ुद
उसके दरिया में कहीं जल नहीं है  |
 
उसके साथ ज़िंदगी है कुछ ऐसी
जर्रों की ख़ाक को इंसां कर दे |
 
वो ग़ैरत की बेड़ियाँ गर पहना दे
तो अजनबियों को भी अपना कर दे |
 
कहानी कुछ ऐसी लिखी है उन्होनें
जो सच को भी सपना कर दे |
 
जिनकी चमक से हमें रोशनी है
उन्हें आज कल रोशनी की कमी है |
 
जिस ग़ज़ल से हमें दिल्लगी है
उस के जिस्म में कहीं दिल नहीं है  |
 
 
                      – sahar

मेरी ख्वाहिश

कुछ किस्मत हमारी भी ऐसी होती,
राहों में तू हमसफ़र होती।
मंजिलों से तब दिल न लगाते,
न रस्तों की हमको फिक्र होती।

काश ऐसी भी कोई इस समुन्दर में लहर होती,
जो संग मेरे हर पहर होती।
फिर करवटें न बदलते हम रात भर,
ख़ामोशी हमारी भी जुबां होती।

काश ऐसे तुम हमारे साथ होते,
जैसे तुम धुन और हम साज होते।
फिर ज़िन्दगी के गीत बेसुरे न होते,
और शायद हम भी इतने बुरे न होते।

काश तू मेरे आसमाँ में उड़ पाती,
तो मेरे मन की गहराइयों को छू पाती।
नज़दीक से तूने मुझे देखा नहीं,
वरना मेरी खामोशियों को भी सुन पाती।

– सहर

दो ग़ज़लें

1-
जी रहे थे हम एक मोती की ख़्वाहिश लिए
तू मिला कि जैसे समन्दर मिल गया ।
वक़्त बेवक्त एक साथी की कमी खलती थी
तू मिला तो मुझे हमसफ़र मिल गया ।
इंतज़ार है कि कभी हम-तुम भी मिलेंगे
कह सकूँगा कि शब को ‘सहर’ मिल गया  ।
2-
जो अधूरी छोड़ दी थी लिखकर कहीं
वो ग़ज़ल अब शायद मुकम्मल हो जाये।
एक अरसे से जो क़ैद थी दिल में
वो धड़कन अब शायद खो जाये।
कोई और नशा महसूस नहीं होता
जब नसों में इश्क़ लहू हो जाये।
ले रहा है बस उसका नाम बार-बार
ये वो दिल है जिसे दिलबर की आरज़ू हो जाये।
– सहर

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