इरशाद – 9

एक बार फिर मज़हब की लकीरों  को लफ़्ज़ों से धोया है  : 
 
श्री हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित महाकाव्य ‘मधुशाला’ का एक अंश। 

वक़्त की धूल 

कुछ चीज़ें कभी पुरानी नहीं होती
वक़्त की धूल उड़ जाती है ख़ुद बख़ुद
समय की ज़ंग नहीं मिटा पाती,
कई यादों की चमक ।
ये मज़बूत चट्टान वक़्त की,
काट नहीं पाती उन लम्हों की लहरों को ।
जो उफान ले रही हैं मन की रेत पर
बचपन, दोस्ती और आवारगी
अरसों पुरानी पहली दिल्लगी,
जब बचायी थी पहली ज़िन्दगी ।
सब कहते हैं वक़्त से कोई जीत नहीं सकता,
पर मेरी यादों से वो हर बार हार जाता है ।
कुछ चीज़ें कभी पुरानी नहीं होती
ख़ुद बख़ुद उड़ जाती है वक़्त की धूल

– सहर

कुछ भावनाएँ

कुछ लोग न जाने कहाँ खो गए इस भीड़ में ?
कोई आहट ना , न दिखाई दिये
शोरगुल एसा था हर जगह,
ना हमें सुन सके ना सुनाई दिये
पहले जिन्दगी फिर यादों से कुछ यूँ हुये रुख़सत
कि फिर सपनों में भी ना दिखाई दिये।

– सहर

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