एक ग़ज़ल महबूब के नाम। 

                                   – सहर 

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Ek ghazal.

जो अधूरी छोड़ दी थी लिखकर कहीं
वो ग़ज़ल अब शायद मुकम्मल हो जाये।
एक अरसे से जो क़ैद थी दिल में
वो धड़कन अब शायद खो जाये।
कोई और नशा महसूस नहीं होता
जब नसों में इश्क़ लहू हो जाये।
ले रहा है बस उसका नाम बार-बार
ये वो दिल है जिसे दिलबर की आरज़ू हो जाये।
– सहर

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