इरशाद – 9

एक बार फिर मज़हब की लकीरों  को लफ़्ज़ों से धोया है  : 
 
श्री हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित महाकाव्य ‘मधुशाला’ का एक अंश। 

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कुछ भावनाएँ

कुछ लोग न जाने कहाँ खो गए इस भीड़ में ?
कोई आहट ना , न दिखाई दिये
शोरगुल एसा था हर जगह,
ना हमें सुन सके ना सुनाई दिये
पहले जिन्दगी फिर यादों से कुछ यूँ हुये रुख़सत
कि फिर सपनों में भी ना दिखाई दिये।

– सहर

इरशाद – 1

मेरे रक्त में कविता बह रही है,
बहते बहते मुझसे कुछ कह रही है |
– सहर

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