खोज खुदा की। 

कोई कहता है मंदिर में मिलेगा

तो कोई कहता है मस्जिद में ढूँढो

कोई बताता है रास्ते अनेक

तो कोई सुझाता है खुद से पूछो
कहीं किसी ने कहा कि पत्थरों

के सामने हो जा नतमस्तक

तो किसी ने मुझे पढ़ाई

गीता और कुरआन की पुस्तक
किसी ने यह न बताया आज तक

की ईश्वर कौन है ?

जिससे भी पूछो यह सवाल

वो आज तक मौन है
शराबी से पूछा तो उसने

मदिरालय का रास्ता दिखाया

पंडित से पूछा तो

महागुरुओं से मिलवाया
कहा मौलवी ने कि है ये

सब अल्लाह की हुकूमत

कौन जानता है आखिर

कैसे बन गयी ये कुदरत
ढूंढा मैंने बड़ी बेसब्री से खुदा को

समझना चाहा अपनी बदलती अदा को
रफ्ता-रफ्ता अब ज़ेहन में

उतर रहा है ये एहसास

मेरे लफ़्ज़ों में ही रहता है

वो हर लम्हा मेरे पास
           – सहर

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इरशाद – 14

शायरी की गहराइयों में हौसला है और उम्मीद भी, शायद आप भी इन लफ़्ज़ों को पढ़कर ये समझ पाएं :

“इतना भी ना-उम्मीद दिल-ए-कम-नज़र न हो,
मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो |”

                                                  – नरेश कुमार शाद |

Urdu Words:

ना-उम्मीद : Hopeless, dejected
दिल-ए-कम-नज़र- narrow sighted heart
शाम-ए-अलम- evening of sorrow
सहर – dawn,morning

अब बस। 

ये पंक्तियाँ वक़्त की धूल खा रहीं थी मेरी डायरी के पन्नों में, आज इन्हें आज़ाद करने का वक़्त आ गया।

“अब बस।”

दिल से निकले तो ये कविता है,
दर्द में ये शायरी है।
ये सिलसिला लफ़्ज़ों का,
अब बस आख़िरी है।

होंठों पे लिख लीजिये,
तो शायद लफ़्ज़ से नज़र आयें।
वर्ना कोरा ख़त है,
अब बस फाड़कर फेंक दीजिये।

जितने ग़म में चूर हैं हम,
उतने ग़म में आप भी चूर होगे क्या ?
सिलसिला से महफ़िलें का कीजिये ख़त्म,
अब बस पैमाना तोड़कर फेंक दीजिये।

मुस्कान मेरी है तमाशा एक,
बात करने की है भाषा एक।
मुँह मोड़कर किताबों से,
अब बस अपनी चुप्पी तोड़ दीजिये।

कुछ ख़ास पर्दों में छुपाकर रखो,
कुछ अपने अन्दर बचाकर रखो।
जंग चल रही है ख़ुद से ही, जानते होगे,
अब बस ये जंग जीत लीजिये।

तारुफ कीजिये,
ये क्या पर्दों की साज़िश है ?
लफ़्ज़ कहिये लबों से ,
आज फिर से गुज़ारिश है।

मेरे इश्क़ की क्या
ये आज़माइश है ?
क्यों टुकड़ों में मौत देते हो मुझे बार-बार,
एक बार में ही जान माँग लीजिये।

– सहर

इरशाद -9 

धुँध सा छा गया है चारों ओर,
सुनता हूँ ख़ामोशियों का शोर
खो गया हर शख़्स इंसानियत का,
कमज़ोर सी है हर डोर ।

बहुत कुछ सोचा था,
पर लग गये शायद वक़्त को |
टूटे ख़्वाबों की काँच बटोरता हूँ,
कुछ टुकड़े मिलते हैं मोहब्बत से रंगे।

– सहर

English Translation.

There us a dense fog all around,
I listen the noise of silence.
Ever last man of humanity is lost,
every thread of love is fragile.

I planned a lot of things,
but time indeed has wings.
As I collect the pieces of my broken dreams,
I occasionally find love stained fragments. 

– sahar

इरशाद -9 

धुँध सा छा गया है चारों ओर,
सुनता हूँ ख़ामोशियों का शोर
खो गया हर शख़्स इंसानियत का,
कमज़ोर सी है हर डोर ।

बहुत कुछ सोचा था,
पर लग गये शायद वक़्त को |
टूटे ख़्वाबों की काँच बटोरता हूँ,
कुछ टुकड़े मिलते हैं मोहब्बत से रंगे।

– सहर

English Translation.

There us a dense fog all around,
I listen the noise if silence.
Ever last man of humanity is lost,
every thread of love is fragile.

I planned a lot of things,
but time indeed has wings.
As I collect the pieces of my broken dreams,
I occassionally fund sone fragments stained with love.

– sahar

वक़्त क्या ज़ाया करें ।

क्या खोया और क्या पाया ?

ये सोचकर अब वक़्त क्या ज़ाया करें ।

क्या ख़र्चा और क्या कमाया ?

ये सोचकर अब वक़्त क्या ज़ाया करें ।

किसने दिल जीता और किससे धोखा खाया ?

ये सोचकर अब वक़्त क्या ज़ाया करें ।

जीते किस किस से और किसको हराया ,

ये सोचकर अब वक़्त क्या ज़ाया करें  ।

इरशाद – 2

गर मुस्कुराए ना होते तुम हमारी ख़ुशी में,

तो हम भी आपके ग़म में ग़मज़दा ना होते। 

                                    –  सहर 

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