इरशाद- 25

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” डूब जाए शमा चरागों को हँसाने की जुस्तुजू में ,
रात भर इसी सिलसिले में बस परवाने फ़िदा होते रहे। “

– सहर

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Ek Gazal 

एक ग़ज़ल के चन्द अश्आर :

अफ़सानों सा मैं रात के अंधेरों का मोहताज नहीं,

शाहाब-ए-साकिब हूँ, जलते हुये पिघल जाऊँगा। 
मदमस्त हवाओं सा मैं काफ़िर नहीं,

तेज़ तूफ़ाँ हूँ, चीरते हुये निकल जाऊँगा। 
रौशन आफ़ताब सा मैं ख़ैर क़ाबिल नहीं,

जुगनू हूँ, रोशनी सा इस जहाँ में बिखर जाऊँगा। 

                                        – सहर
Urdu words: 
अफ़साना- star

मोहताज- in need

शाहाब-ए-साकिब- meteor/meteorite

काफ़िर- infidel

आफ़ताब- sun

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