जो ग़ज़ल है

whatsapp-image-2017-02-07-at-17-49-37
जिस ग़ज़ल से हमें दिल्लगी है
उस के जिस्म में कहीं दिल नहीं हैं |
 
वो सहरा में लिपटा जल रहा है ख़ुद
उसके दरिया में कहीं जल नहीं है  |
 
उसके साथ ज़िंदगी है कुछ ऐसी
जर्रों की ख़ाक को इंसां कर दे |
 
वो ग़ैरत की बेड़ियाँ गर पहना दे
तो अजनबियों को भी अपना कर दे |
 
कहानी कुछ ऐसी लिखी है उन्होनें
जो सच को भी सपना कर दे |
 
जिनकी चमक से हमें रोशनी है
उन्हें आज कल रोशनी की कमी है |
 
जिस ग़ज़ल से हमें दिल्लगी है
उस के जिस्म में कहीं दिल नहीं है  |
 
 
                      – sahar
Advertisements

इरशाद-10

ख़्वाब अनगिनत और बेशक़ीमती थे,
सिर्फ ख्वाबों की कोई नहीं बिसात ।
जब चला मुसाफिर बन के सफर पर,
हर दर जीता, हर दर खायी मात।

– सहर।

translation:

dreams were infinite and priceless,
but dreams alone held no value.

when I actually travlled the distance ,
I won everywhere and everywhere I lost.

– sahar

इरशाद -9 

धुँध सा छा गया है चारों ओर,
सुनता हूँ ख़ामोशियों का शोर
खो गया हर शख़्स इंसानियत का,
कमज़ोर सी है हर डोर ।

बहुत कुछ सोचा था,
पर लग गये शायद वक़्त को |
टूटे ख़्वाबों की काँच बटोरता हूँ,
कुछ टुकड़े मिलते हैं मोहब्बत से रंगे।

– सहर

English Translation.

There us a dense fog all around,
I listen the noise of silence.
Ever last man of humanity is lost,
every thread of love is fragile.

I planned a lot of things,
but time indeed has wings.
As I collect the pieces of my broken dreams,
I occasionally find love stained fragments. 

– sahar

इरशाद -9 

धुँध सा छा गया है चारों ओर,
सुनता हूँ ख़ामोशियों का शोर
खो गया हर शख़्स इंसानियत का,
कमज़ोर सी है हर डोर ।

बहुत कुछ सोचा था,
पर लग गये शायद वक़्त को |
टूटे ख़्वाबों की काँच बटोरता हूँ,
कुछ टुकड़े मिलते हैं मोहब्बत से रंगे।

– सहर

English Translation.

There us a dense fog all around,
I listen the noise if silence.
Ever last man of humanity is lost,
every thread of love is fragile.

I planned a lot of things,
but time indeed has wings.
As I collect the pieces of my broken dreams,
I occassionally fund sone fragments stained with love.

– sahar

इरशाद – 4 

रोज़ सोचते हैं कुछ नया होगा ,

अब तू मिल भी जाए तो क्या होगा ?

जिस इंसान ने चाहा था तुम्हें 

मर चुका है वो, पता होगा।  

        – सहर

दो ग़ज़लें

1-
जी रहे थे हम एक मोती की ख़्वाहिश लिए
तू मिला कि जैसे समन्दर मिल गया ।
वक़्त बेवक्त एक साथी की कमी खलती थी
तू मिला तो मुझे हमसफ़र मिल गया ।
इंतज़ार है कि कभी हम-तुम भी मिलेंगे
कह सकूँगा कि शब को ‘सहर’ मिल गया  ।
2-
जो अधूरी छोड़ दी थी लिखकर कहीं
वो ग़ज़ल अब शायद मुकम्मल हो जाये।
एक अरसे से जो क़ैद थी दिल में
वो धड़कन अब शायद खो जाये।
कोई और नशा महसूस नहीं होता
जब नसों में इश्क़ लहू हो जाये।
ले रहा है बस उसका नाम बार-बार
ये वो दिल है जिसे दिलबर की आरज़ू हो जाये।
– सहर

Powered by WordPress.com.

Up ↑