मधुशाला

“मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,
प्याले में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला,
इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया –
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!।११९।”

– हरिवंश राय बच्चन |

 

 

इरशाद – 9

एक बार फिर मज़हब की लकीरों  को लफ़्ज़ों से धोया है  : 
 
श्री हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित महाकाव्य ‘मधुशाला’ का एक अंश। 

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