अब बस। 

ये पंक्तियाँ वक़्त की धूल खा रहीं थी मेरी डायरी के पन्नों में, आज इन्हें आज़ाद करने का वक़्त आ गया।

“अब बस।”

दिल से निकले तो ये कविता है,
दर्द में ये शायरी है।
ये सिलसिला लफ़्ज़ों का,
अब बस आख़िरी है।

होंठों पे लिख लीजिये,
तो शायद लफ़्ज़ से नज़र आयें।
वर्ना कोरा ख़त है,
अब बस फाड़कर फेंक दीजिये।

जितने ग़म में चूर हैं हम,
उतने ग़म में आप भी चूर होगे क्या ?
सिलसिला से महफ़िलें का कीजिये ख़त्म,
अब बस पैमाना तोड़कर फेंक दीजिये।

मुस्कान मेरी है तमाशा एक,
बात करने की है भाषा एक।
मुँह मोड़कर किताबों से,
अब बस अपनी चुप्पी तोड़ दीजिये।

कुछ ख़ास पर्दों में छुपाकर रखो,
कुछ अपने अन्दर बचाकर रखो।
जंग चल रही है ख़ुद से ही, जानते होगे,
अब बस ये जंग जीत लीजिये।

तारुफ कीजिये,
ये क्या पर्दों की साज़िश है ?
लफ़्ज़ कहिये लबों से ,
आज फिर से गुज़ारिश है।

मेरे इश्क़ की क्या
ये आज़माइश है ?
क्यों टुकड़ों में मौत देते हो मुझे बार-बार,
एक बार में ही जान माँग लीजिये।

– सहर

एक ग़ज़ल 

जिन्हें एक मुद्दत से,सजा रखा था पैमाने में,
उन महफिलों ने आज जाकर,दम तोड़ा मैखाने में ।

बहुत अंधेरों से उजालों में, खींच लाया हूँ इस रात को,
कोई उम्मीद जिंदा है, आज भी इस दीवाने में ।

वो रेत में ढूंढता था, न जाने कौन सा दरिया,
एक बूंद तक न मिली जिसे सारे ज़माने में ।

लापता हो गयी उसकी आँखों से दीवानगी,
इस दुनिया के धुएँ के कारखाने में ।

फिर भी, दिल खोलकर बाँटता रहा वो खुशियों की दौलत,
कोई अजीब सुकूं मिलता था उसे खुद को लुटाने में ।

अपनी मोहब्बत का ज़िक्र अब तलक़ किसी को न किया,
वो शिकस्त कहाँ याद करने में जो खायी भूल जाने में ।

ख़ामोशी से बैठकर वो हर रोज़ शब से सहर,
ढूँढ़ता रहा महफिलों को पैमाने में।

– सहर

featured photograph ©mayank mishra.

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