बचपन

बचपन

बड़े अच्छे दिन थे बचपन के
भोली भाली आवारगी थी
हल्के-हल्के धुँधले ख़्वाब थे
छोटी-छोटी चाहतें थीं
मुस्कान चेहरे की चौखट पर
डेरा बसाए रहती थी
ये दुनिया हमें अपने
सीने से लगाए रखती थी
हम सो भी जाएँ थककर
तो रात जगाए रखती थी
सुबह सूरज की चमक
आँखें बिछाए रहती थी
पतंगे हमारी उड़ान की
छोटी छोटी हमनवा
आसमान में कब तक
आँखें गड़ाए रखते थे
लहरें हमारी ख़ुशियाँ थी
दो चार हमारे नाम थे
बड़ी छोटी हमारी दुनिया
पर बड़े हमारे काम थे
तारों पर हुक्म चलाते थे
हर वक़्त गीत गाते थे
हवाओं पर सवार होकर
मीलों घूम आते थे
चिड़ियों के घोसलों से
अंडे चुराते थे
बड़े भोले दिन थे बचपन के
बात बात पर शर्माते थे
बड़े अच्छे दिन थे बचपन के।

‘सहर’

वक़्त की धूल 

कुछ चीज़ें कभी पुरानी नहीं होती
वक़्त की धूल उड़ जाती है ख़ुद बख़ुद
समय की ज़ंग नहीं मिटा पाती,
कई यादों की चमक ।
ये मज़बूत चट्टान वक़्त की,
काट नहीं पाती उन लम्हों की लहरों को ।
जो उफान ले रही हैं मन की रेत पर
बचपन, दोस्ती और आवारगी
अरसों पुरानी पहली दिल्लगी,
जब बचायी थी पहली ज़िन्दगी ।
सब कहते हैं वक़्त से कोई जीत नहीं सकता,
पर मेरी यादों से वो हर बार हार जाता है ।
कुछ चीज़ें कभी पुरानी नहीं होती
ख़ुद बख़ुद उड़ जाती है वक़्त की धूल

– सहर

कुछ भावनाएँ

कुछ लोग न जाने कहाँ खो गए इस भीड़ में ?
कोई आहट ना , न दिखाई दिये
शोरगुल एसा था हर जगह,
ना हमें सुन सके ना सुनाई दिये
पहले जिन्दगी फिर यादों से कुछ यूँ हुये रुख़सत
कि फिर सपनों में भी ना दिखाई दिये।

– सहर

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