Irshaad- 23

“ऐसा क्या हुआ कि हम भूल गए 

अपने रंग , अपने शबाब 

धुलते गए हर बारिश के साथ 

हमारे शौक़ , हमारे रुबाब 

अपनी महफ़िलों से उठकर, आ गए ये कहाँ 

अब चढ़ती नहीं उस क़दर वो पुरानी शराब 

यूँ ही गुज़रा जा रहा है ये कारवाँ भी 

क़ैद होकर ही रह गया लफ़्ज़ों का सैलाब ”   

                                           – Mayank ‘Sahar’ Mishra

 

 

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इरशाद – 1

मेरे रक्त में कविता बह रही है,
बहते बहते मुझसे कुछ कह रही है |
– सहर

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