इरशाद – 14

शायरी की गहराइयों में हौसला है और उम्मीद भी, शायद आप भी इन लफ़्ज़ों को पढ़कर ये समझ पाएं :

“इतना भी ना-उम्मीद दिल-ए-कम-नज़र न हो,
मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो |”

                                                  – नरेश कुमार शाद |

Urdu Words:

ना-उम्मीद : Hopeless, dejected
दिल-ए-कम-नज़र- narrow sighted heart
शाम-ए-अलम- evening of sorrow
सहर – dawn,morning

Ek Gazal 

एक ग़ज़ल के चन्द अश्आर :

अफ़सानों सा मैं रात के अंधेरों का मोहताज नहीं,

शाहाब-ए-साकिब हूँ, जलते हुये पिघल जाऊँगा। 
मदमस्त हवाओं सा मैं काफ़िर नहीं,

तेज़ तूफ़ाँ हूँ, चीरते हुये निकल जाऊँगा। 
रौशन आफ़ताब सा मैं ख़ैर क़ाबिल नहीं,

जुगनू हूँ, रोशनी सा इस जहाँ में बिखर जाऊँगा। 

                                        – सहर
Urdu words: 
अफ़साना- star

मोहताज- in need

शाहाब-ए-साकिब- meteor/meteorite

काफ़िर- infidel

आफ़ताब- sun

एक ग़ज़ल 

जिन्हें एक मुद्दत से,सजा रखा था पैमाने में,
उन महफिलों ने आज जाकर,दम तोड़ा मैखाने में ।

बहुत अंधेरों से उजालों में, खींच लाया हूँ इस रात को,
कोई उम्मीद जिंदा है, आज भी इस दीवाने में ।

वो रेत में ढूंढता था, न जाने कौन सा दरिया,
एक बूंद तक न मिली जिसे सारे ज़माने में ।

लापता हो गयी उसकी आँखों से दीवानगी,
इस दुनिया के धुएँ के कारखाने में ।

फिर भी, दिल खोलकर बाँटता रहा वो खुशियों की दौलत,
कोई अजीब सुकूं मिलता था उसे खुद को लुटाने में ।

अपनी मोहब्बत का ज़िक्र अब तलक़ किसी को न किया,
वो शिकस्त कहाँ याद करने में जो खायी भूल जाने में ।

ख़ामोशी से बैठकर वो हर रोज़ शब से सहर,
ढूँढ़ता रहा महफिलों को पैमाने में।

– सहर

featured photograph ©mayank mishra.

दो ग़ज़लें

1-
जी रहे थे हम एक मोती की ख़्वाहिश लिए
तू मिला कि जैसे समन्दर मिल गया ।
वक़्त बेवक्त एक साथी की कमी खलती थी
तू मिला तो मुझे हमसफ़र मिल गया ।
इंतज़ार है कि कभी हम-तुम भी मिलेंगे
कह सकूँगा कि शब को ‘सहर’ मिल गया  ।
2-
जो अधूरी छोड़ दी थी लिखकर कहीं
वो ग़ज़ल अब शायद मुकम्मल हो जाये।
एक अरसे से जो क़ैद थी दिल में
वो धड़कन अब शायद खो जाये।
कोई और नशा महसूस नहीं होता
जब नसों में इश्क़ लहू हो जाये।
ले रहा है बस उसका नाम बार-बार
ये वो दिल है जिसे दिलबर की आरज़ू हो जाये।
– सहर

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