इरशाद- 25

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” डूब जाए शमा चरागों को हँसाने की जुस्तुजू में ,
रात भर इसी सिलसिले में बस परवाने फ़िदा होते रहे। “

– सहर

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इरशाद -3

तू खुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा,

दोनों इंसा हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें ।

                                    – अहमद फ़राज़। 

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