जो ग़ज़ल है

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जिस ग़ज़ल से हमें दिल्लगी है
उस के जिस्म में कहीं दिल नहीं हैं |
 
वो सहरा में लिपटा जल रहा है ख़ुद
उसके दरिया में कहीं जल नहीं है  |
 
उसके साथ ज़िंदगी है कुछ ऐसी
जर्रों की ख़ाक को इंसां कर दे |
 
वो ग़ैरत की बेड़ियाँ गर पहना दे
तो अजनबियों को भी अपना कर दे |
 
कहानी कुछ ऐसी लिखी है उन्होनें
जो सच को भी सपना कर दे |
 
जिनकी चमक से हमें रोशनी है
उन्हें आज कल रोशनी की कमी है |
 
जिस ग़ज़ल से हमें दिल्लगी है
उस के जिस्म में कहीं दिल नहीं है  |
 
 
                      – sahar

Irshaad- 23

“ऐसा क्या हुआ कि हम भूल गए 

अपने रंग , अपने शबाब 

धुलते गए हर बारिश के साथ 

हमारे शौक़ , हमारे रुबाब 

अपनी महफ़िलों से उठकर, आ गए ये कहाँ 

अब चढ़ती नहीं उस क़दर वो पुरानी शराब 

यूँ ही गुज़रा जा रहा है ये कारवाँ भी 

क़ैद होकर ही रह गया लफ़्ज़ों का सैलाब ”   

                                           – Mayank ‘Sahar’ Mishra

 

 

इरशाद -15

” देखते हैं कहाँ ले जाकर छोड़ेगा ये सफ़र ज़िन्दगी का,
हमारी कहानी तो मौत पर भी ख़त्म ना होगी | “
– सहर

इरशाद – 14

शायरी की गहराइयों में हौसला है और उम्मीद भी, शायद आप भी इन लफ़्ज़ों को पढ़कर ये समझ पाएं :

“इतना भी ना-उम्मीद दिल-ए-कम-नज़र न हो,
मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो |”

                                                  – नरेश कुमार शाद |

Urdu Words:

ना-उम्मीद : Hopeless, dejected
दिल-ए-कम-नज़र- narrow sighted heart
शाम-ए-अलम- evening of sorrow
सहर – dawn,morning

Ek Gazal 

एक ग़ज़ल के चन्द अश्आर :

अफ़सानों सा मैं रात के अंधेरों का मोहताज नहीं,

शाहाब-ए-साकिब हूँ, जलते हुये पिघल जाऊँगा। 
मदमस्त हवाओं सा मैं काफ़िर नहीं,

तेज़ तूफ़ाँ हूँ, चीरते हुये निकल जाऊँगा। 
रौशन आफ़ताब सा मैं ख़ैर क़ाबिल नहीं,

जुगनू हूँ, रोशनी सा इस जहाँ में बिखर जाऊँगा। 

                                        – सहर
Urdu words: 
अफ़साना- star

मोहताज- in need

शाहाब-ए-साकिब- meteor/meteorite

काफ़िर- infidel

आफ़ताब- sun

इरशाद-11

जी में जो आती है कर गुज़रो कहीं ऐसा न हो,
कल पशेमाँ हों कि क्यूँ दिल का कहा माना नही |
                                            – अहमद फ़राज़

 

कुछ भावनाएँ

कुछ लोग न जाने कहाँ खो गए इस भीड़ में ?
कोई आहट ना , न दिखाई दिये
शोरगुल एसा था हर जगह,
ना हमें सुन सके ना सुनाई दिये
पहले जिन्दगी फिर यादों से कुछ यूँ हुये रुख़सत
कि फिर सपनों में भी ना दिखाई दिये।

– सहर

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