वक़्त क्या ज़ाया करें ।

क्या खोया और क्या पाया ?

ये सोचकर अब वक़्त क्या ज़ाया करें ।

क्या ख़र्चा और क्या कमाया ?

ये सोचकर अब वक़्त क्या ज़ाया करें ।

किसने दिल जीता और किससे धोखा खाया ?

ये सोचकर अब वक़्त क्या ज़ाया करें ।

जीते किस किस से और किसको हराया ,

ये सोचकर अब वक़्त क्या ज़ाया करें  ।

वक़्त की धूल 

कुछ चीज़ें कभी पुरानी नहीं होती
वक़्त की धूल उड़ जाती है ख़ुद बख़ुद
समय की ज़ंग नहीं मिटा पाती,
कई यादों की चमक ।
ये मज़बूत चट्टान वक़्त की,
काट नहीं पाती उन लम्हों की लहरों को ।
जो उफान ले रही हैं मन की रेत पर
बचपन, दोस्ती और आवारगी
अरसों पुरानी पहली दिल्लगी,
जब बचायी थी पहली ज़िन्दगी ।
सब कहते हैं वक़्त से कोई जीत नहीं सकता,
पर मेरी यादों से वो हर बार हार जाता है ।
कुछ चीज़ें कभी पुरानी नहीं होती
ख़ुद बख़ुद उड़ जाती है वक़्त की धूल

– सहर

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